Jugalbandi

 This is an interesting story. It all started when Khare wished me on my birthday on facebook by posting a few lines on my wall. I replied back by writing a verse as well. And thus this jugalbandi began. Starting at 1 in the night, it continued till 3 p.m the next day, when finally we decided to stop, as the last verse was very concluding.

Here’s the facebeook link to this episode:  https://www.facebook.com/akshay8928/posts/10150717966798968

Starting with a mere birthday wish, we ended up writing about alocholism, false dreams, illusions, god, the crazy mankind, the quest for truth.. finally ending with the backdrop “Its All In Your Head”.  Very abstract,  written in amateurish Hindi, but definitely with a lot of heart.  And yes, there’s a guest appearance by Saahil, who threw in a verse when we were in dire need of it 😉 

ये दुआ करता हूँ खुदा से, के

कामयाबी के शिखर पे नाम आपका हो,

हर कदम पर दुनिया सलाम हो,

और जन्मदिन पे मिले हज़ारों खुशियाँ,

चाहे उनमे शामिल हम न हों

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कामयाबी का शिखर अभी नज़रों से परे है,

पर ख़ुशी तो इन टेढ़े मढ़े रास्तों में है;

कदम अभी तो लडखडाते और डगमगाते हैं,

पर दिल जहाँ चाहे, उधर ये ले जाते हैं;

छोटी छोटी इकठ्ठा होके मिली हज़ारों खुशियाँ,

दुआ ये है की आप ख़ुशी में नहीं, ख़ुशी आप में शामिल हो.

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शिखर तो सपनों के नज़रों की उन आँखों में है,

जिनके आंसुओं की लौ से क़यामत बने;

 वो रस्ते जो कभी सीधे साधे न हो सके…

शामिल हुई थी पल भर में खुशियाँ तमाम,

जब इकठ्ठा उन सपनों में देखी हमने मधुशाला हज़ार..

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 सपने देखते देखते धुन्दला जाती नज़रें कभी,

चंद आंसू आँखों को फिर साफ़ कर जाते;

पीछे मुडके देखना छोड़ दिया रास्तों को,

मोड़ इतने आये की रास्ते पहचाने न जाते;

कह दो तो आंसुओं से प्याले भर दें,

अगर उनकी लौ से क़यामत बन जाए….

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यूँ कहते कहते ही तो जाके

वो अदबुध आंसू प्याले पर पड़े;

जिसके अमृत के संग हम तुम

आँखें हमेशा धुंधलाते रहे;

क़यामत को देखने की जुर्रत के लिए ताकत मिली

जब इकठ्ठा हुई हज़ार आंसुओं की वोह तपन अदबुध…

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आंसुओं से सींची आग ऐसी लगी की बढती ही गयी,

यह न मालुम था की खुद इसमें जलने लगेंगे;

वैसे तो क़यामत देखने की ताकत जुटाई थी,

यह न पता था की मौका आने पर पाँव उठ न सकेंगे;

सपने देख देख कर पलकों पर इमारत थी बनाई,

नीव तो खारे पानी और कांच के प्यालों की ही थी;

पलक झपकते ही गिर पड़ी वो इमारत,

आइना देख लेते तो दिख जाती क़यामत…

…………………………………………………………………………………………….

क्या हुआ अगर आईने में वो क़यामत न दिखी;

 कांच के उन प्यालों में ही सही,

क़यामत धुन्द्लाते हुए जन्नत बनकर जरूर दिखी;

हर झलकते पलक के साथ,

 आग बुझी और तपन बढ़ी…

 ……………………………………………………………………………………………

वैसे तो लोग प्यालों में क्या कुछ नहीं देख लेते;

अपने जीवन की कहानी और उस कहानी का अंत देख लेते;

पत्थर में मोहब्बत और कविता में व्यंग देख लेते;

आँखों से निकले पानी में सातों रंग देख लेते;

खुदा नाज़ कर तेरे उन बन्दों पर,

जो अपनी आग में तपके मौत में जन्म देख लेते..

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पत्थर में भगवान् को मोहब्बत,

और कविता के साज़ के राज़ को व्यंग,

भूल से हम समझ बैठे;

आँखों के पानी से बना इन्द्रधनुष का आठवा रंग,

 पानी के सच्चाई का बेरंग ही तो है..

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देखो उस पत्थर की जान को, हज़ारों सालों से

जिसने दुनिया का बोझ लेना सीखा है;

सुनो उन लहरों की आवाज़ को, दर्द भरी गहराइयों से

निकाल के लाती हैं जो सबसे सुरीले गीत;

हमने अगर दुनिया को कुछ दिया तो बस झूट,

आँखें खोल कर देखो हर तरफ खुदा है, सच्चाई है….

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क्यों व्यर्थता दिखाते हो खुदा की तलाश में;

सच्चाई ढूँढ़ते हो, टकराते हो तन्हाई से;

ये लहरें, ये सुरीले गीत तो बस एक सपना हैं,

एक भीख जो तुम खरीदते हो अपनी तन्हाई से.

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अक्सर दर्द सच्चाई के दरवाज़े खोल देता है;

दिल के उन छुपे कोनो की अनकही बातें बोल देता है;

झूट और अहंकार के चलते फिरते पुतलों की जगह,

हवा से बातें करना और लहरों से गीत सुनना सीखा है हमने;

खुद के बनाए हुए पिंजरों में रहने वालो,

एक बार बहार निकलके देखो, की कौन जी रहा है तन्हाई में…

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जब तन्हाई बन बैठे बनिया,

तो भीख में मिले गीतों की कीमत;

पिंजरे में रहने वाले क्या समझे,

निकल कर ही तो वो समझें कि लहरों में है तन्हाई

 जिसकी कीमत गीतों में है…

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ख्यालों में इतने खोये कि हकीकत भी सपना सा लगने लगी;

दर्द मलहम बनता रहा और तन्हाई से दोस्ती होने लगी;

क्या हम भी किसी की रचना का किरदार हैं;सोचने लगे किसकी कल्पना है ये,

कौन हैं हम सपना और हकीकत में फर्क करने वाले,

कुछ दिन के मेहमान, कौन हैं हम खुदा को नकारने वाले;

राजों से भरा समंदर और सवालों से सजा आसमान है;

नापने चले थे गहराइयां और चूमने चले थे फलक;

जब आँखें मूंदी तो देखा, अपनी ही रचना है ये,

सोच के बीजों से बोया हुआ, मन के अन्दर ही यह सारा जहाँ है.

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 एक है किरदार, जिसकी सोच है रचना वही;

जो सीमित फलक के सवालों से या समुन्दर के राजों से नहीं;

 क्यूंकि वो किरदार है मन, हम नहीं

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One thought on “Jugalbandi

  1. B.Manmohan Reddy says:

    havent read the poem … but yah..completely agree with “Its all in the head.” We are seeing this diversity of forms and not the one-existence because of the ripples in the mind!

    To borrow a famous metaphor from Indian Philosophy :

    We know both the wave and the ocean are made of water, but yet we differentiate between the wave and the ocean.So this universe is one ocean of existence, which is of the nature of Absolute Existence-Absolute Knowledge- Absolute Bliss, but yet we see all these manifold forms and waves called men, animals, plants, suns, stars on this ocean because of the ripples in the mind.Mind needs to be calmed and reality will show itself, nature will give up her secrets, THE DOORS OF PERCEPTION will be completely opened! 🙂

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